नारी

सदा

एक काया मात्र ।

तुफानी बादलो को बाहो में समेटे

बंदर को तकती

बिस्मित

अस्थिर ।

असहाय प्रकृती की

चीरंतन चींख जैसे अपने लहू में लिये

चलती,

सम्भलति- सम्भालती

थक जाती ।

 

क्षणिक

स्त्ता से परिचित ।

गलते लोहे की बूंद में तैरती

एक तरनी

ओस की पहली अंकुरित पंखुरि में

दिया जलाये

बेझिजक

सो जाती ।

 

आज-कल

सदा है क्षण में बिलम्बित ।

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